Alwar News: अलवर में वन मंत्री बैठे नौकरशाही के खिलफ धरने पर
Alwar News: अलवर में वन मंत्री बैठे नौकरशाही के खिलफ धरने पर
छोटा अखबार।
राजस्थान के अलवर जिले में बुधवार को सत्ता और नौकरशाही के बीच एक बड़ा और तीखा टकराव का मामला संज्ञान में आया है। जानकारी के अनुसार वर्ष 2012 में भर्ती किए गए 329 सफाई कर्मचारियों को लंबे समय बाद भी नियुक्ति-पत्र न मिलने का मामला बताया जा रहा है। कई दिनों से अपनी मांगों को लेकर धरना दे रहे सफाई कर्मियों के समर्थन में प्रदेश के वन राज्यमंत्री संजय शर्मा न केवल खुलकर सामने आ गए, बल्कि उन्होंने जिला प्रशासन और नगर निगम के शीर्ष अधिकारियों के खिलाफ मोर्चा खोल दिया।
मामले की गंभीरता और दिनभर चले इस हाई-वोल्टेज ड्रामे की गूंज जयपुर में मुख्यमंत्री कार्यालय तक पहुंची। इसके बाद मुख्यमंत्री भजनलाल शर्मा को खुद इस मामले में दखल देना पड़ा। मुख्यमंत्री के निर्देश के बाद जिला कलक्टर ने तीन सदस्यीय कमेटी का गठन कर दस्तावेजों की जांच के बाद पात्र अभ्यर्थियों को नियुक्ति पत्र देने के आदेश जारी किए हैं।
बुधवार को अलवर नगर निगम परिसर में उस समय स्थिति तनावपूर्ण हो गई, जब कई दिनों से आंदोलन कर रहे सफाई कर्मचारियों के बीच वन राज्यमंत्री पहुंचे गये। सफाई कर्मियों की व्यथा सुनने के बाद मंत्री शर्मा खुद उनके साथ धरने पर बैठ गए। सरकार के एक जिम्मेदार मंत्री का अपनी ही सरकार के अधिकारियों के खिलाफ धरने पर बैठना शहर में चर्चा का विषय बन गया।धरनास्थल पर मंत्री का गुस्सा सातवें आसमान पर था। उन्होंने जिला कलक्टर आर्तिका शुक्ला और नगर निगम आयुक्त सोहन सिंह नरूका पर तीखा जुबानी हमला बोला। मंत्री ने खुलेआम आरोप लगाया कि ये दोनों अधिकारी राज्य सरकार के आदेशों की धज्जियां उड़ा रहे हैं। उन्होंने कहा, "कलक्टर आर्तिका शुक्ला और नगर निगम आयुक्त सोहन सिंह नरूका सरकार के आदेश नहीं मान रहे हैं। इस संबंध में सरकार की ओर से कई बार स्पष्ट आदेश आ चुके हैं, लेकिन ये दोनों किसी की बात सुनने को तैयार नहीं हैं।
स्थल पर जब नगर निगम आयुक्त सोहन सिंह नरूका पहुंचे, तो मंत्री संजय शर्मा ने उन्हें सबके सामने आड़े हाथों लिया। मंत्री ने आयुक्त से सीधे शब्दों में कहा, "अगर कलक्टर इस मामले में नियोक्ता नहीं हैं, तो नगर निगम के आयुक्त होने के नाते आप तो नियोक्ता हैं। आप आगे बढ़कर इन कर्मचारियों को नियुक्ति पत्र क्यों नहीं दे रहे? कलक्टर को तो वैसे भी समाज का भला करना नहीं है। "मंत्री शर्मा यहीं नहीं रुके, उन्होंने अधिकारियों की कार्यप्रणाली पर सवाल उठाते हुए तीखे लहजे में पूछा, "आप लोग अधिकारियों और सरकार की बात क्यों नहीं मान रहे हैं? कलक्टर और आप लोग इस शहर से आखिर चाहते क्या हैं, यह साफ-साफ बता दीजिए। क्या आप दोनों राज्य सरकार से भी बड़े हो गए हैं? या फिर आप खुद को ही सरकार मान बैठे हैं? आप मेरी बात भी नहीं सुन रहे और स्वायत्त शासन मंत्री झाबर सिंह खर्रा के निर्देशों को भी हवा में उड़ा रहे हैं। अब आप ही बता दीजिए कि आपसे काम करवाने के लिए और किससे कहलवाना पड़ेगा?
आपको बतादें कि यह पूरा विवाद वर्ष 2012 में निकाली गई सफाई कर्मचारियों की भर्ती से जुड़ा हुआ है। उस समय अलवर में 329 सफाई कर्मियों का चयन किया गया था, लेकिन प्रशासनिक पेचीदगियों, कानूनी अड़चनों और दस्तावेजों की स्क्रूटनी के नाम पर पिछले 14 वर्षों से इन चयनित अभ्यर्थियों को नियुक्ति पत्र नहीं दिए गए। अपनी जायज मांग को लेकर ये अभ्यर्थी सालों से सरकारी दफ्तरों के चक्कर काट रहे थे। पिछले कुछ दिनों से इन अभ्यर्थियों ने नगर निगम परिसर में अनिश्चितकालीन धरना शुरू कर दिया था। कर्मचारियों का कहना था कि जब सरकार और विभाग ने उन्हें पात्र मान लिया है, तो स्थानीय प्रशासन जानबूझकर फाइल को अटका कर बैठा है।
अलवर नगर निगम में दिनभर चले इस सियासी और प्रशासनिक घटनाक्रम की पल-पल की रिपोर्ट जयपुर में मुख्यमंत्री भजनलाल शर्मा तक पहुंच रही थी। एक कैबिनेट स्तर के मंत्री का अपनी ही ब्यूरोक्रेसी के खिलाफ धरने पर बैठना सरकार की छवि के लिए ठीक नहीं था। मामले की संवेदनशीलता को देखते हुए मुख्यमंत्री ने तुरंत एक्शन लिया।
मुख्यमंत्री भजनलाल शर्मा ने अलवर जिला कलक्टर आर्तिका शुक्ला को सीधे निर्देश दिए कि इस मामले का तुरंत निस्तारण किया जाए। सीएम के आदेश के बाद प्रशासन तुरंत हरकत में आया। मुख्यमंत्री के निर्देशानुसार जिला कलक्टर ने एक तीन सदस्यीय उच्च स्तरीय कमेटी का गठन किया है। यह कमेटी वर्ष 2012 के चयनित सभी 329 सफाई कर्मचारियों के दस्तावेजों और पात्रता की गहनता से जांच करेगी। जांच में जो भी अभ्यर्थी सही और पात्र पाए जाएंगे, उन्हें बिना किसी देरी के तुरंत नियुक्ति पत्र जारी कर दिए जाएंगे।
मुख्यमंत्री के इस फैसले और कमेटी गठन के आश्वासन के बाद मंत्री संजय शर्मा और आंदोलनकारी सफाई कर्मियों ने अपना धरना समाप्त करने का निर्णय लिया। हालांकि, इस पूरे घटनाक्रम ने एक बार फिर राजस्थान में मंत्रियों और नौकरशाही के बीच समन्वय की कमी को उजागर कर दिया है। अब देखना होगा कि तीन सदस्यीय कमेटी कितने दिनों में अपनी रिपोर्ट सौंपती है और इन पीड़ित सफाई कर्मियों का सालों पुराना इंतजार कब खत्म होता है।

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