जी-जेन का जन-विद्रोह: राजनीतिक श्वापदों की 'आह' और 'वाह' का खूनी नाटक
जी-जेन का जन-विद्रोह: राजनीतिक श्वापदों की 'आह' और 'वाह' का खूनी नाटक
छोटा अखबार।
मशहूर क्रांतिकारी कवि पाश ने लिखा था— "सबसे खतरनाक होता है हमारे सपनों का मर जाना।" आज स्वतंत्र भारत के इतिहास में 'जी-जेन' यानी इस देश की तरुण तरुणाई का सड़कों पर उतरना महज एक आंदोलन नहीं, बल्कि दमघोंटू व्यवस्था के खिलाफ एक युगांतकारी जन-विद्रोह है। किंतु, इस वैचारिक और व्यवस्था-परिवर्तन की आग पर सत्ता और प्रतिपक्ष के रूप में बैठे राजनीतिक श्वापद (भेड़िए) अपनी-अपनी चुनावी हांडियां चढ़ाने के लिए लपलपाती जीभों के साथ घात लगाकर बैठ गए हैं। युवाओं के लहू से सींचे गए इस जनांदोलन की चौखट पर, ये भेड़िए कभी पाखंडी सहानुभूति की 'आह' भरते हैं, तो कभी अपनी गिद्ध-दृष्टि टिकाकर छद्म क्रांति की 'वाह-वाह' की मुनादी करते हैं।
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पाखंडी सहानुभूति की मरणशैया: सियासत की 'आह'—
जब देश का युवा अपने अधिकारों, रोजगार की अस्मिता और पेपर लीक जैसी घिनौनी धांधलियों के खिलाफ सड़कों पर लाठियां खाता है, तब इन राजनीतिक भेड़ियों का करुणा-विलास शुरू होता है। प्रतिपक्ष (कांग्रेस) तुरंत अपने वातानुकूलित कमरों से बाहर निकलकर इस युवा विलाप को अपने राजनीतिक पुनरुत्थान का ईंधन बनाने लगता है। उनकी 'आह' में युवाओं के बर्बाद होते भविष्य की तड़प नहीं, बल्कि सत्ता की मलाई से दूर रहने की छटपटाहट होती है। यह 'आह' मकरध्वज के उन आंसुओं जैसी है जो शिकार को निगलने से ठीक पहले उसकी आखों से टपकते हैं।
दूसरी ओर, सत्ता के मद में चूर शासक वर्ग (भाजपा) भी पीछे नहीं रहता। वे देश की अस्मिता, कानून और राष्ट्रहित के नाम पर झूठी 'आह' भरते हैं कि भोली-भाली युवा पीढ़ी को 'अराजक तत्वों' द्वारा गुमराह किया जा रहा है। ये दोनों ही धड़े युवाओं की हड्डियों पर अपनी सत्ता का महल खड़ा करना चाहते हैं। इनका यह रुदन, यह आहें, केवल और केवल युवाओं के आक्रोश को कुंद करने का एक रणनीतिक षड्यंत्र है।
अवसरवाद का नग्न नृत्य: श्रेय लूटने की 'वाह'—
जैसे ही यह जन-आंदोलन सत्ता की चूलें हिलाने लगता है, इन भेड़ियों की लार टपकने लगती है और वे 'वाह-वाह' के नारों से आसमान गुंजा देते हैं। विपक्ष इस जनाक्रोश को अपनी वैचारिक जीत घोषित कर युवाओं की पीठ थपथपाता है, उन्हें 'क्रांतिकारी' और 'चे ग्वेरा' की उपमाएं दी जाती हैं। वहीं, सत्ताधारी दल आंदोलन को दबाने या समझौतों की मेज पर लाने के बाद अपनी 'उदारता' और 'संवेदनशीलता' की खुद ही वाह-वाही करने लगता है।यह 'वाह' दरअसल युवाओं के आत्मसम्मान और उनके मौलिक संघर्ष का क्रूर अपहरण है। जिस रणबांकुरे युवा ने अपने पसीने और खून से इस आंदोलन की जमीन तैयार की, उसकी विजय का सेहरा ये राजनीतिक गिद्ध अपने सिर बांधने के लिए आपस में ही हिंसक संघर्ष करने लगते हैं। यह 'वाह' युवाओं का हौसला बढ़ाने के लिए नहीं, बल्कि उनके संघर्ष को चुनावी घोषणापत्रों के पिंजरे में कैद करने के लिए दी जाती है।
श्वापद-संस्कृति से मुक्ति का शंखनाद—
युवाओं को यह कटु सत्य आत्मसात करना होगा कि जो आज उनके आक्रोश पर तालियां बजाकर 'वाह-वाह' कर रहे हैं, सत्ता के सिंहासन पर बैठते ही वे ही उनके सीनों पर बूटों की नाप लेने से गुरेज नहीं करेंगे। चाहे कांग्रेस हो या भाजपा, दोनों की आत्मा में एक ही श्वापद (भेड़िया) निवास करता है, जिसका एकमात्र धर्म सत्ता-सुख है। जी-जेन के इस उग्र जन-ज्वार को इन भेड़ियों की 'आह' और 'वाह' के इस मायाजाल को छिन्न-भिन्न करना होगा। युवाओं की वास्तविक 'वाह' तब होगी जब वे इन राजनीतिक श्वापदों के जबड़ों से अपने अधिकारों को छीनकर अपनी नियति का इतिहास स्वयं अपने हाथों से लिखेंगे।
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