Rajasthan News: आईजी बदले, चुनौतियां नहीं: पुलिस कप्तानों के बदलने से नहीं बदलती अपराध की ग्राउंड रियलिटी

Rajasthan News: आईजी बदले, चुनौतियां नहीं: पुलिस कप्तानों के बदलने से नहीं बदलती अपराध की ग्राउंड रियलिटी


छोटा अखबार।

पुलिस महकमे में आला अफसरों के तबादले और नए आईजी (महानिरीक्षक) की तैनाती अमूमन एक नई उम्मीद लेकर आती है। नए अधिकारी अपनी प्राथमिकताओं का ढोल पीटते हैं, कड़े तेवर दिखाते हैं और कानून-व्यवस्था को पटरी पर लाने के बड़े-बड़े दावे करते हैं। लेकिन हकीकत की जमीन पर कदम रखते ही उनका सामना उन्हीं पुराने, रिसते हुए जख्मों से होता है जो दशकों से इस व्यवस्था को खोखला कर रहे हैं। चेहरे भले ही नए हों, लेकिन अपराध के मुद्दे और अपराधियों के गठजोड़ वही पुराने और बदस्तूर जारी हैं।

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संगठित अपराध और माफिया का बढ़ता दुस्साहस—

नए आईजी के सामने सबसे बड़ी चुनौती संगठित अपराध और बजरी माफिया की समानांतर सत्ता को उखाड़ने की है। नदियों का सीना चीरकर अवैध बजरी निकालने वाले माफियाओं का दुस्साहस इस कदर बढ़ चुका है कि वे पुलिस और प्रशासनिक अमले पर हमला करने से भी नहीं कतराते। इस अवैध कारोबार में बहने वाला बेहिसाब पैसा व्यवस्था की धमनियों में भ्रष्टाचार बनकर दौड़ रहा है। अधिकारी आते हैं, विशेष टास्क फोर्स बनाते हैं, कुछ डंपर जब्त होते हैं, लेकिन मुख्य सरगना हमेशा कानून के लंबे हाथों से दूर ही रहते हैं।

नारकोटिक्स और साइबर ठगी का नया जाल—

पारंपरिक अपराधों के साथ-साथ अब नारकोटिक्स तस्करी और साइबर अपराध पुलिस के लिए सबसे बड़ा सिरदर्द बन चुके हैं। युवा पीढ़ी को खोखला कर रहा नशे का कारोबार अब गली-मोहल्लों तक पैर पसार चुका है। सीमा पार और अंतरराज्यीय तस्करों के नेटवर्क को तोड़ना नए आईजी के लिए किसी अग्निपरीक्षा से कम नहीं है। दूसरी ओर, साइबर अपराधी देश के किसी सुदूर कोने में बैठकर आम जनता की गाढ़ी कमाई पर डाका डाल रहे हैं। तकनीकी रूप से अपग्रेड हो रहे इन अपराधियों के मुकाबले हमारी पुलिस का बुनियादी ढांचा आज भी पुराना और धीमा नजर आता है।

महिला-बाल सुरक्षा और बेकाबू ट्रैफिक—

कानून व्यवस्था के दावों की सबसे बड़ी पोल महिलाओं और बच्चों के विरुद्ध बढ़ते अपराधों से खुलती है। पोक्सो एक्ट और घरेलू हिंसा के मामलों की बढ़ती संख्या समाज और पुलिस दोनों के लिए चिंता का विषय है। नए आईजी के लिए थानों में पीड़ित-अनुकूल माहौल बनाना और मामलों का त्वरित निस्तारण करना सबसे बड़ी मानवीय प्राथमिकता होनी चाहिए। इसके साथ ही, शहरों की सड़कों पर रेंगता हुआ ट्रैफिक और रोज होती दुर्घटनाएं पुलिस की रोजमर्रा की नाकामी को दर्शाती हैं। वीआईपी मूवमेंट में व्यस्त रहने वाली पुलिस आम जनता को जाम से मुक्ति दिलाने में हमेशा हांफती हुई नजर आती है।

अपराधियों द्वारा अवैध संपत्तियों के दम पर खड़ा किया गया साम्राज्य और उनका रसूख आज भी कायम है। इतिहास गवाह है कि कई आईजी आए और कई गए, लेकिन ये मुद्दे जस के तस खड़े हैं। नए मुखिया को केवल कागजी समीक्षा बैठकों से बाहर निकलकर फील्ड में कड़े फैसले लेने होंगे। जब तक राजनीतिक संरक्षण और पुलिस-अपराधी गठजोड़ पर सीधा प्रहार नहीं होगा, तब तक हर नई तैनाती केवल एक प्रशासनिक औपचारिकता बनकर रह जाएगी।

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