Urban Local Body Elections 2026: टिकटों की नग्नता और लोकतंत्र का मुजरा: जब मलाई के लिए घर ही बन गया रणक्षेत्र
Urban Local Body Elections 2026: टिकटों की नग्नता और लोकतंत्र का मुजरा: जब मलाई के लिए घर ही बन गया रणक्षेत्र
छोटा अखबार।
नगर निकाय चुनाव 2026 की यह चुनावी नौटंकी आज अपने अंतिम पड़ाव यानी नामांकन की आखिरी तारीख तक पहुँच चुकी है। भाजपा और कांग्रेस, दोनों ही महा-दुकानों के शटर के पीछे इस समय वह 'अग्निपरीक्षा' चल रही है, जहाँ निष्ठा की सरेआम नीलामी हो रही है। टिकट वितरण ने दोनों पार्टियों के आलाकमान की पैंट ढीली कर दी है। वे समझ नहीं पा रहे कि किस वफादार को लात मारें और किस बागी के तलवे चाटें। भीतरघात और बगावत का बारूद इस कदर बिछा है कि आज शाम होते-होते दोनों ही दलों के दफ्तरों से वफादारी की अर्थियाँ उठना तय है।
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| AI Photo |
इस चुनाव का सबसे कड़वा और मजेदार सच यह है कि आज गली का 'जणा-जणा' अचानक खुद को वॉर्ड का होने वाला 'सुल्तान' समझने लगा है। समाज सेवा का भूत सबके सिर पर इस तरह सवार है कि हर कोई 'सत्ता की मलाई' चाटने को इस कदर आतुर है मानो वॉर्ड पार्षद का पद नहीं, बल्कि कुबेर के खजाने का सीधा लाइसेंस मिल रहा हो। जनता की भलाई जाए तेल लेने, कार्यकर्ताओं को तो बस पार्षद बनकर अपनी सात पीढ़ियों का 'उद्धार' करना है। हर कोई खुद को सर्वश्रेष्ठ और दूसरे को निकम्मा साबित करने के लिए मोहल्ले के नुक्कड़ पर छाती ठोक रहा है।
लेकिन राजनीति के असली जादूगर तो हमारे 'मंजे हुए नेताजी' हैं। उनकी गणित के आगे न्यूटन और आइंस्टीन के नियम भी फेल हैं। उनका एक सूत्रीय एजेंडा है—वॉर्ड में अपनी 'चांचली' कम नहीं होनी चाहिए, चाहे इसके लिए आत्मा को गिरवी क्यों न रखना पड़े। जनता को पूरी तरह भ्रमित और मूर्ख बनाने के लिए नेताजी ने अपने ही घर में 'रणक्षेत्र' सजा दिया है।
घर की इस प्रायोजित बगावत का आलम यह है कि लोकतंत्र अब सीधे बेडरूम और डाइनिंग टेबल तक पहुँच गया है। बेटा सुबह-सुबह 'पंजे' वाली पार्टी का झंडा उठाकर अपनी दावेदारी ठोकता है, तो उसके पूज्य माता-पिता 'फूल' वाली पार्टी के दफ्तर में जाकर निष्ठा की कसमें खाते हैं। ननद साहिबा 'फूल' के लिए सहेलियों को वॉट्सऐप फॉरवर्ड भेज रही हैं, तो उनकी सगी भाभी 'पंजे' की मजबूती के लिए किटी पार्टी में वोट मांग रही हैं। रही-सही कसर ससुर जी पूरी कर रहे हैं, जो किसी तीसरी पार्टी के सिंबल पर या निर्दलीय बनकर पूरे मोहल्ले में खुद को 'भीष्म पितामह' घोषित कर चुके हैं।
इस पारिवारिक ड्रामे के पीछे की गणित इतनी शातिर है कि वॉर्ड में चाहे फूल खिले या पंजा चले, जीत का सर्टिफिकेट और मलाई अंततः इसी एक तिजोरी में ही जमा होनी है। यह विचारधारा का चुनाव नहीं, बल्कि एक ही छत के नीचे खेला जा रहा 'फिक्सिंग का खेल' है। राजनीति की इस नग्नता में एक और अद्भुत दृश्य तब देखने को मिलता है, जब अपने वॉर्ड में आरक्षण या जाति का जुगाड़ नहीं बैठता। हमारे शूरवीर दावेदार निराश होने के बजाय तुरंत अपने नोटों की गड्डियों वाली 'रूपयों की स्प्रिंग' दबाते हैं। इस स्प्रिंग के दम पर वे सीधे अपने वॉर्ड से उछलते हैं और पड़ोसी या किसी दूसरे माकूल वॉर्ड में जाकर 'पैराशूट लैंडिंग' कर देते हैं। उन्हें वॉर्ड की जनता की समस्याओं से कोई सरोकार नहीं, उन्हें बस वो जमीन चाहिए जहाँ से वे चुनाव जीत सकें।
आज शाम नामांकन का सूरज ढलने तक यह सारा पाखंड अपने चरम पर होगा। जो टिकट की लॉटरी जीत जाएगा, वह पार्टी का सबसे वफादार कुत्ता बनने को तैयार हो जाएगा और जो खाली हाथ रह जाएगा, वह 'जनता की पुकार' का ढोंग रचकर बागी का चोला ओढ़ लेगा। जनता चुपचाप कोने में बैठकर मुस्कुरा रही है, क्योंकि उसे पता है कि इस 'वार्ड मेले' में जो भी जीतेगा, वह अगले पांच साल तक सिर्फ अपना और अपने परिवार का ही 'उद्धार' करेगा।

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