Ajmer News: खबर अजमेर से— और दद्दू ने आख़िर मार ली पाँवों पर कुल्हाड़ी
Ajmer News: खबर अजमेर से— और दद्दू ने आख़िर मार ली पाँवों पर कुल्हाड़ी
✍️सुरेन्द्र चतुर्वेदी
छोटा अखबार।
अजमेर नगर निगम के दद्दू ने आख़िरकार अपनी पार्टी से इस्तीफ़ा देकर सभी दायित्वों से मुक्ति का रास्ता चुन लिया है। इस्तीफ़ा भले ही उन्होंने स्वेच्छा से दिया हो, लेकिन इसके साथ ही उन्होंने अपने कभी सियासी संरक्षक रहे भाऊ पर गंभीर आरोपों की झड़ी लगा दी है। सबसे गंभीर आरोप यह है कि भाऊ ने अपने पद और प्रभाव का इस्तेमाल कर उनके ख़िलाफ़ सरकार से आदेश जारी करवाए और अभियोजन की स्वीकृति दिलवाई। दूसरी ओर, उपलब्ध घटनाक्रम यह बताता है कि जिस पुराने मामले में अब अभियोजन स्वीकृति मिली है, उसमें एक आईएएस अधिकारी ने स्वयं गवाही देकर मामले को सही बताते हुए अभियोजन स्वीकृति की मांग की थी। यानी अब यह तय होना बाक़ी है कि आरोपों में कितना दम है और जांच में सच क्या निकलकर सामने आता है।
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| AI Photo |
लेकिन राजनीति में समय भी बड़ा बेरहम होता है। जिस दद्दू के बारे में वर्षों से यह धारणा बनाई जाती रही कि उनका कोई बाल बांका नहीं कर सकता, उनके ऊपर अब क़ानूनी तलवार साफ़ दिखाई देने लगी है। मामला कोई कल का नहीं, कई सालों पुराना है। मीडिया इस प्रकरण का पीछा करता रहा और सवाल उठाता रहा कि सरकार के स्तर पर आख़िर इतनी लंबी अवधि तक अभियोजन की स्वीकृति क्यों अटकी रही?
पिछली सरकार के कार्यकाल में भी यह स्वीकृति नहीं हुई थी। तब भाऊ इतने बुरे नहीं लगते थे। तब सियासी सायबान भी वही थे और संरक्षण की छतरी भी वही। अब वही भाऊ कटघरे में हैं तो सवाल यह है कि बदला क्या है—भाऊ या परिस्थितियां? दद्दू एंड कंपनी की ओर से भाऊ को कोसने का सिलसिला लंबे समय से चल रहा था। भाऊ ने भी जवाब में तलवार निकालने के बजाय ख़ामोशी को हथियार बनाया। सियासत में कई बार चुप रहने वाला आदमी हार नहीं रहा होता, वह सिर्फ़ अपनी चाल चलने का सही वक्त तलाश रहा होता है।
इसे ही शायद कहते हैं—‘तू डाल-डाल, मैं पात-पात।’
अब अभियोजन स्वीकृति ने दद्दू के धैर्य के गुब्बारे में जैसे आलपिन लगा दी है। वे खुलकर आरोप लगा रहे हैं कि संवैधानिक भाऊ ने अपने प्रभाव का दुरुपयोग कर स्वास्थ्य शासन विभाग से यह स्वीकृति जारी करवाई। लेकिन सवाल फिर वही है—अगर एक आईएएस अधिकारी खुद गवाही देकर मामले को सही ठहराता है और अभियोजन की मांग करता है तो उसमें भाऊ की हथेली कितनी और कहां लगती है? असली सवाल तो यह होना चाहिए कि जिस स्वीकृति की जरूरत वर्षों पहले महसूस की गई थी, वह अब तक टलती क्यों रही?
मैं पिछले कई दिनों से दद्दू के ऊपर मंडरा रही क़ानूनी तलवार की ओर इशारा कर रहा था। संकेत दे रहा था कि उत्तर के किसी खलीफा समझने वाले नेता को लेकर कभी भी चौंकाने वाली खबर सामने आ सकती है। खबर आ गई। बेचारे बकरे की मम्मी आखिर कब तक खैर मनाती?ज़ियादा से ज़्यादा से ज्यादा बकरीद तक!
लेकिन कहानी केवल अदालत और अभियोजन तक सीमित नहीं रहने वाली। दद्दू ने जिस अंदाज़ में इस्तीफ़ा दिया है और उसके बाद जिस तरह की चेतावनियां दी हैं, उससे साफ़ है कि अजमेर उत्तर की निकाय राजनीति अब और दिलचस्प होने वाली है। पार्टी से बाहर रहकर चुनावी राजनीति में अपनी चालें चलने की उनकी तैयारी दिखाई दे रही है। यानी इस्तीफा शायद सियासी संन्यास नहीं, बल्कि सियासी स्वतंत्रता का ऐलान है।
अजमेर उत्तर में अब कई बंदर अपनी-अपनी पूंछ में आग लगाकर उछल-कूद करने को तैयार दिखाई दे रहे हैं। फ़र्क़ सिर्फ इतना है कि अब तक जो भीतरघात था, वह खुली जंग में बदल सकता है। टिकट, वार्ड, समर्थक, पुराने हिसाब और नई महत्वाकांक्षाएं—सब एक साथ मैदान में उतरेंगे। और जब व्यक्तिगत रंजिशें चुनावी गणित से मिलती हैं तो फिर चुनाव सिर्फ चुनाव नहीं रहता, हिसाब-किताब का अखाड़ा बन जाता है।
दद्दू ने भाऊ को कटघरे में खड़ा कर दिया है। लेकिन शायद उन्होंने भाऊ की तीरंदाज़ी को थोड़ा हल्के में लिया है। सियासी मैदान में भाऊ की चालें तो सामने आएंगी ही, असली परीक्षा अब क़ानूनी मोर्चे पर भी होगी। अगर जांच निष्पक्ष हुई और मामले की तह तक पहुंची तो केवल दद्दू ही नहीं, उस दौर के कई किरदारों के चेहरे भी सामने आ सकते हैं। फिर सवाल यह नहीं रहेगा कि किसने किसके खिलाफ साजिश की, सवाल यह होगा कि इतने वर्षों तक किसने किसे बचाया और क्यों? फिलहाल सियासी गलियारों में एक ही चर्चा है—दद्दू ने इस्तीफ़ा देकर रास्ता अपने लिए खोला है या अपने पैरों पर कुल्हाड़ी मार ली है? इसका फ़ैसला निकाय चुनाव करेंगे और शायद अदालत भी। लेकिन इतना तय है कि अजमेर उत्तर में अब पर्दे के पीछे का खेल पर्दे के सामने आने वाला है। और इस बार तीर भी चलेंगे, तलवारें भी निकलेंगी और पुराने सियासी हिसाब भी चुकते होंगे।

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