Jaipur News: टोंक रोड पर नायाब सड़क बनाने वाले....... इंजीनियर, ठेकेदारों को मिलना चाहिए राष्ट्रपति अवॉर्ड और जनता को पहनानी चाहिए इन काबिलो को माला

 Jaipur News: टोंक रोड पर नायाब सड़क बनाने वाले.......

इंजीनियर, ठेकेदारों को मिलना चाहिए राष्ट्रपति अवॉर्ड और जनता को पहनानी चाहिए इन काबिलो को माला

-महेश झालानी


छोटा अखबार।

मानसून की पहली गंभीर बारिश ने ही जयपुर के विकास मॉडल की पोल खोल दी। टोंक रोड पर नई बनी सड़क धंस गई। जिस सड़क पर वर्षों तक चलना था, वह कुछ बारिश भी नहीं झेल सकी। यह केवल सड़क का धंसना नहीं, बल्कि निर्माण व्यवस्था, गुणवत्ता नियंत्रण और सरकारी जवाबदेही का ध्वस्त होना है। सबसे बड़ा सवाल यह है कि यदि नई सड़क पहली ही बारिश में बैठ जाए तो करोड़ों रुपये आखिर खर्च किस पर हुए? क्या निर्माण मानकों का पालन हुआ? क्या गुणवत्ता परीक्षण केवल कागजों में हुआ? क्या भुगतान बिना पर्याप्त जांच के कर दिया गया? इन सवालों के जवाब जनता जानना चाहती है।

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हर बार की तरह केवल ठेकेदार को बलि का बकरा बनाकर मामला खत्म नहीं किया जा सकता। किसी भी सड़क का निर्माण केवल ठेकेदार नहीं करता। डिज़ाइन की स्वीकृति से लेकर निर्माण की निगरानी, गुणवत्ता परीक्षण, माप पुस्तिका, तकनीकी प्रमाणन और भुगतान तक पूरी प्रक्रिया सरकारी इंजीनियरों की देखरेख में होती है। यदि सड़क धंस गई है तो संबंधित अभियंताओं की जिम्मेदारी ठेकेदार से कम नहीं है। केवल ठेकेदार के विरुद्ध एफआईआर दर्ज करना पर्याप्त नहीं होगा । संबंधित इंजीनियरों और डायरेक्टर इंजीनियरिंग को भी अभियुक्त बनाया जाना चाहिए। प्रथम दृष्टया उन्हें तत्काल निलंबित कर स्वतंत्र और समयबद्ध जांच कराई जानी चाहिए। यदि मिलीभगत या लापरवाही सिद्ध होती है तो उनके विरुद्ध भी आपराधिक कार्रवाई होनी चाहिए। 

इस पूरे प्रकरण पर नगरीय विकास मंत्री की चुप्पी भी कई सवाल खड़े करती है। मंत्री को सार्वजनिक रूप से बताना चाहिए कि सड़क क्यों धंसी, जिम्मेदार कौन हैं, कितने अधिकारियों पर कार्रवाई होगी और भविष्य में ऐसी घटनाएं रोकने के लिए क्या व्यवस्था की जाएगी। जनता के टैक्स के पैसे से बनने वाली सड़कें यदि पहली ही बारिश में जवाब दे दें तो सरकार केवल औपचारिक जांच की घोषणा करके अपनी जिम्मेदारी से नहीं बच सकती। यह तो अभी ट्रेलर है, पूरी फिल्म अभी बाकी है। मानसून अभी शुरू ही हुआ है। जैसे-जैसे बारिश बढ़ेगी, वैसे-वैसे घटिया निर्माण के नए-नए कारनामे सामने आएंगे। 

कहीं सड़कें धंसेंगी, कहीं डामर उखड़ेगा, कहीं सीवर धंसेंगे और कहीं जलभराव विकास के दावों की असलियत उजागर करेगा। यदि अभी कठोर कार्रवाई नहीं हुई तो पूरा मानसून जनता के लिए परेशानी और भ्रष्ट निर्माण व्यवस्था के लिए संरक्षण का मौसम बन जाएगा। सबसे दुर्भाग्यपूर्ण बात यह है कि हर साल करोड़ों रुपये सड़कों के निर्माण और मरम्मत पर खर्च होते हैं, लेकिन जवाबदेही तय नहीं होती। सड़क टूटती है, जांच बैठती है, फाइलें चलती हैं और कुछ समय बाद मामला ठंडे बस्ते में चला जाता है। यही कारण है कि लापरवाही और भ्रष्टाचार का सिलसिला लगातार जारी है।

अब समय आ गया है कि सरकार केवल गड्ढे भरने की नहीं, बल्कि व्यवस्था के गड्ढे भरने की शुरुआत करे। दोषियों को बचाने की परंपरा समाप्त करनी होगी। जब तक ठेकेदारों के साथ-साथ लापरवाह अधिकारियों और जिम्मेदार इंजीनियरों पर भी आपराधिक मुकदमे दर्ज नहीं होंगे, निलंबन नहीं होगा और आर्थिक दायित्व तय नहीं होगा, तब तक जनता को मजबूत सड़कें नहीं, केवल खोखले दावे ही मिलते रहेंगे। सवाल सिर्फ इतना है कि धंसी हुई सड़क की मरम्मत कौन करेगा? असली सवाल यह है कि ध्वस्त हो चुकी जवाबदेही की मरम्मत कौन करेगा?

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