20 लाख करोड़ का पैकेज, निर्मम तानाशाह बनने की तरफ मजबूत कदम


ऋषिकेश राजोरिया
   वरिष्ठ पत्रकार 


20 लाख करोड़ का पैकेज, निर्मम तानाशाह बनने की तरफ मजबूत कदम


छोटा अखबार।


आदरणीय प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने कोरोना जनित अव्यवस्था के बाद आत्मनिर्भर भारत अभियान के नाम से जो 20 लाख करोड़ रुपए का आर्थिक पैकेज घोषित किया है, वह उनका विश्व में सबसे लोकप्रिय तानाशाह बनने की ओर एक मजबूत कदम है। इसके साथ ही यह लोकतंत्र के प्रति आस्था रखने वाले लोगों के लिए एक बड़ी चुनौती भी है। मोदी के साथ राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से शिक्षित हिंदुत्व के नाम पर बुद्धि का दुरुपयोग करने वाले एक-दो करोड़ लोगों की फौज है, जिनकी सक्रियता से वह प्रधानमंत्री पद प्राप्त करने में सफल हुए हैं। 


प्रधानमंत्री बनने के बाद मोदी को यह लगने लगा है कि इस देश पर शासन करना बहुत आसान है क्योंकि यहां की जनता वादे सुनकर और प्रचार में बहकर वोट दे देती है। शासन संभालने के बाद कौन देश का भला कर रहा है और कौन लोकतंत्र की भावना के साथ विश्वासघात कर रहा है, इस पर जनता ध्यान नहीं देती। सरकार चलाने वाले अधिकारियों में ज्यादातर सत्ता के प्रति समर्पित होते हैं। वे प्रधानमंत्री के इशारे पर लोकतंत्र का मजाक बनाने के लिए कुछ भी करने को तैयार रहते हैं। चुनाव पांच साल में एक बार होते हैं। चार साल तक शासक अपना शासन निर्द्वंद्व रूप से चला सकता है। चुनाव भी सरकारी अधिकारी ही करवाते हैं और चुनाव आयुक्त के पास पक्षपात करने के पर्याप्त अवसर होते हैं। 



मोदी ने कैसे चुनाव जीता, कैसे प्रधानमंत्री बन गए और कैसे दूसरी बार बने, अब क्या कर रहे हैं, यह बात छिपी हुई नहीं है। उनकी कार्यप्रणाली में भरपूर छल-कपट दिखाई देता है। दो महीने पहले की बात है। मोदी ने हुंकारा लगाया था कि कोरोना के खिलाफ लड़ाई लड़नी है। जनता तैयार रहे। पूरे देश को कोरोना के खिलाफ लड़ाई में झोंकते हुए  उन्होंने लोगबंदी कर दी, जनता से ताली-थाली बजवा ली, दीपक जलवा लिए। डॉक्टर, नर्स, सफाई कर्मी और पुलिस को उन्होंने कोरोना के खिलाफ योद्धा घोषित किया था। सेना से उनका स्वागत भी करवा दिया। सेना ने आसमान से फूल बरसा दिए। अब मोदी अपनी बात से एकदम पलटी मारते हुए जनता से कह रहे हैं कि कोरोना एक अवसर है। इस अवसर का उपयोग हम आत्मनिर्भर भारत बनाने में करेंगे। इसके लिए 20 लाख करोड़ रुपए का पैकेज घोषित किया गया है। 
इस 20 लाख करोड़ के पैकेज के पहले चरण में बुधवार 13 मई 2020 को वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने छह लाख रुपए की बंदरबांट की योजना बताई है। पहले चरण का पैकेज सूक्ष्म, लघु, मध्यम (एमएसएमई) उद्योगों को राहत पहुंचाने के लिए है। इसके साथ ही उन्होंने एमएसएमई की परिभाषा में बदलाव भी किया है। अब 25 लाख की बजाय एक करोड़ रुपए तक का कारोबार करने वाले उद्योग सूक्ष्म, पांच करोड़ की बजाय 50 करोड़ तक के कारोबार वाले उद्योग लघु और 10 करोड़ की बजाय 100 करोड़ रुपए तक के कारोबार वाले उद्योग मध्यम उद्योग कहलाएंगे। इन उद्योगों को सरकार की गारंटी पर बैंकों से कर्ज मिलेगा। छोटे कारोबारियों को बिना गारंटी के तीन लाख करोड़ रुपए के कर्ज बांटे जाएंगे। दावा किया गया है कि इससे देश के 45 लाख छोटे उद्योगों को राहत मिलेगी। 



यह योजना देखने में लुभावनी लगती है, लेकिन हकीकत अलग हो सकती है। एक बार इंदिरा गांधी ने आपात काल लगा दिया था। उसके बाद हुए चुनाव से पहले उन्होंने स्वरोजगार योजना घोषित की थी, जिसके तहत युवाओं को 25 हजार रुपए का कर्ज बांटा गया था। उस समय कई कांग्रेस कार्यकर्ताओं ने 25-25 हजार रुपए ले लिए थे। इस बार आत्मनिर्भर भारत अभियान के तहत भाजपा कार्यकर्ताओं, स्वयंसेवकों की लॉटरी लगेगी, क्योंकि मोदी को अपने प्रतिबद्ध कार्यकर्ताओं की फौज को कायम रखना है, जिससे पूरे देश में उनका नाम गूंजता रहे। 
मोदी समझ रहे हैं कि निर्धन लोगों को कुछ न कुछ धन मिलता रहे तो समर्थन बना रहेगा, वह सत्ता में बने रहेंगे। यही कारण था कि उन्होंने 2019 के लोकसभा चुनाव से ठीक पहले किसान के खाते में हर दो महीने में दो हजार रुपए जमा करवाने की योजना बनाई थी। किसानों के खातों में उस योजना के तहत धन जमा हो रहा है। इसके अलावा जनधन योजना के तहत भी पांच-पांच सौ रुपए लोगों के खातों में डाले जा रहे हैं। इस तरह करोना के बहाने मोदी ने अधिकांश जनसंख्या को गरीब और असहाय बनाकर उन्हें आर्थिक रूप से पूरी तरह सरकार पर निर्भर बनाने का अवसर खोज लिया है। जिस देश की 139 करोड़ की जनसंख्या में से करीब 80 करोड़ लोग निर्धन हैं, जैसे-तैसे अपना जीवन चलाते हैं, उस देश में धन बांटकर कोई भी सत्ता पर कब्जा कर सकता है। 
नोटबंदी से पहले तमाम राजनीतिक पार्टियां आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर हुआ करती थी। अनेक उद्योग घराने भी आर्थिक रूप से आत्म निर्भर होते थे। चुनाव में हर पार्टी धन खर्च करती थी। कई जगह मतदाताओं को आर्थिक लालच दिया जाता था। नोटबंदी के बाद यह स्थिति नहीं रही। राजनीति में सबसे संपन्न पार्टी भाजपा हो गई और वही सर्वेसर्वा हो गई।
नोटबंदी के बाद उद्योग और व्यापार के हर कोने में सरकार की अड़ंगेबाजी शुरू होने के बाद लोगबंदी या लॉकडाउन ने रही-सही कसर भी पूरी कर दी। अब मोदी सरकार के पास धन है और अधिकांश लोग निर्धन हैं। व्यापार-उद्योग जगत असहाय हो गया है। राजनीतिक पार्टियां कंगाल हो चुकी है। शिक्षा व्यवस्था जानबूझकर चौपट की जा रही है, जिससे कि देश के युवा पढ़-लिखकर समझदार न बन सकें। कुछ समय बाद भारत का सम्माननीय नागरिक बने रहने की शर्त सिर्फ यह होगी कि वह मोदी का समर्थक है या नहीं।
मोदी ने कोरोना के नाम पर बहुत हंगामा किया, अनावश्यक लोगबंदी कर दी। लोगों को जबरन मास्क लगाने और सोशल डिस्टेंसिंग का पालन करने के लिए विवश कर दिया। देश के सामाजिक आर्थिक जीवन को तहस-नहस कर दिया। शहरों से लाखों लोगों के पलायन की स्थिति बना दी। पलायन करने वाले मजदूरों के लिए दो शब्द नहीं कहे। अब अर्थ व्यवस्था को नष्ट करने के बाद  उन्होंने आत्मनिर्भर भारत बनाने का प्रचार शुरू कर दिया है। आत्मनिर्भर कौन होगा? मोदी और मोदी भक्त। इस समय मोदी को चुनौती देने वाला कोई देशभक्त माई का लाल दूर-दूर तक दिखाई नहीं दे रहा है। अंधभक्तों के निरर्थक शोर से पूरा देश हलाकान है। लोगों के दिमाग में यह बात पूरी ताकत से बैठाई जा रही है कि मोदी का कोई विकल्प नहीं। मोदी है तो मुमकिन है। यह मुमकिन स्पष्ट रूप से दिखाई दे रहा है कि इसमें कितनी देशभक्ति है और कितनी निर्मम तानाशाह बनने की ललक।



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