"इतिहास का अंतिम निर्णय नगाड़े नहीं लिखते। तूतियाँ लिखती हैं"
"इतिहास का अंतिम निर्णय नगाड़े नहीं लिखते। तूतियाँ लिखती हैं"
✍️सुरेन्द्र चतुर्वेदी
छोटा अखबार।
नक्कारखाने में तूती की आवाज़—यह अब केवल मुहावरा नहीं, हमारे समय का सबसे कड़वा सच है। सत्ता नक्कारखाना बन चुकी है और ईमानदार बुद्धिजीवियों, बेबाक़ पत्रकारों, प्रतिबद्ध साहित्यकारों तथा ज़िम्मेदार नागरिकों के शब्द तूती की आवाज़! नगाड़े इतने बड़े, बजाने वाले इतने ताक़तवर और उनका शोर इतना प्रायोजित! कि सच बोलने वाला पूरी ताक़त से चीख़े भी तो उसकी आवाज़ प्रचार, पैसे, पद, पुरस्कार, ट्रोल और भय के नीचे दबा दी जाती है।
और किसकी क्या कहूँ? बात ख़ुद से शुरू करूँ तो बेहतर होगा—
पचास साल की मेरी प्रौढ़ पत्रकारिता! आधी सदी मैंने शब्दों को सजाया नहीं, हथियार बनाया। सत्ता किसी की भी रही हो, सवाल किए। नेताओं से, अफ़सरों से, पुलिस से, प्रशासन से और ज़रूरत पड़ी तो अपने आप से भी। किसी दल की चौखट पर माथा नहीं रगड़ा, किसी नेता की आरती नहीं उतारी और किसी कुर्सी को देखकर क़लम की रीढ़ नहीं मोड़ी। फिर भी आज यह स्वीकार करते हुए भीतर कुछ टूटता है कि मेरी पत्रकारिता भी शायद नक्कारखाने में तूती की आवाज़ से अधिक नहीं रही।
यह किसी थके हुए पत्रकार का विलाप नहीं, हमारे समय का अभियोग है—
मैंने वह दौर देखा है जब एक ख़बर से मंत्री की कुर्सी हिलती थी, एक संपादकीय से अफ़सर की नींद उड़ती थी और एक तथ्य सरकार को जवाब देने पर मजबूर कर देता था। आज पूरी फ़ाइल खोल दीजिए, दस्तावेज़ सामने रख दीजिए, प्रमाण पटक दीजिए—सत्ता मुस्कुराती है, ट्रोल गालियाँ देते हैं, समर्थक जयकारा लगाते हैं और अगले दिन कोई नया तमाशा पुराने सच की लाश पर चादर डाल देता है।
तो क्या दोस्तों!! पत्रकारिता हार गई या पत्रकारिता को हराने के लिए पूरा नक्कारखाना खड़ा कर दिया गया—
आज सत्ता केवल संसद, विधानसभा और सचिवालय में नहीं बैठी। वह कैमरे के एंगल में है, विज्ञापन के बजट में है, सोशल मीडिया के ट्रेंड में है, ट्रोल की गाली में है और उस मीडिया मालिक़ की जेब में है जो पूछता है—सच कितना मुनाफ़ा देगा। पत्रकार सवाल पूछने से पहले नौकरी और ईएमआई याद करता है, संपादक ख़बर से पहले सत्ता का मूड देखता है और समाज अन्याय से अधिक मनोरंजन चाहता है। ऐसे में मेरे शब्द कहाँ जाएँ? मेरे वाक्य किस दरवाज़े पर दस्तक दें?मेरे ब्लॉग किसकी नींद तोड़ें? मेरा साहित्य किसकी आत्मा जगाए?
मित्रों!! अपने कहीं न होने का अहसास दुनिया का सबसे ख़तरनाक अहसास है। और आज इस देश के चरित्रवान लोग इसी अहसास से ग्रस्त और त्रस्त हैं। ईमानदार आदमी थका हुआ है, संवेदनशील आदमी अकेला है, सवाल पूछने वाला संदिग्ध है और झुकने से इनकार करने वाला व्यवस्था के लिए अनुपयोगी। क्योंकि जिन हरामी लोगों की इस देश में तूती बोल रही है, उनके सामने मेरे जैसे पत्रकार सचमुच तूती की आवाज़ बनते जा रहे हैं। जिनके पास चरित्र नहीं, उनके पास चैनल हैं। जिनके पास विचार नहीं, उनके पास ट्रोल हैं। जिनके पास तर्क नहीं, उनके पास भीड़ है। जिनके पास ईमान नहीं, उनके पास मंच हैं। अपराधी सम्मानित है, चाटुकार पुरस्कृत है, दलाल प्रतिष्ठित है और सच बोलने वाला अपने अस्तित्व का प्रमाण ढूँढ़ रहा है।
क्या यही लोकतंत्र है? क्या यही वह समाज है जिसके लिए हमने आधी सदी कलम घिसी?
आज ईमानदार होना शायद आसान है, मगर ईमानदार सिद्ध होना लगभग नामुमकिन। चोर अपनी ईमानदारी का विज्ञापन कर रहा है और ईमानदार अपने चरित्र का हलफ़नामा लेकर घूम रहा है। भ्रष्ट के पास काफ़िला है, सच के पास फुटपाथ। दलाल के पास सत्ता के मोबाइल नंबर हैं, पत्रकार के पास दस्तावेज़!
और दोस्तों!! विडंबना देखिए—दस्तावेज़ हार रहे हैं,मोबाइल नंबर जीत रहे हैं! लोग संवेदनशील नहीं रहे, इलाके संवेदनशील हो गए हैं। किसी भूखे बच्चे पर समाज संवेदनशील नहीं होता। किसान की आत्महत्या, बेरोज़गार की टूटती उम्र, बूढ़े की बेबसी और स्त्री की चीख़ हमें देर तक परेशान नहीं करती। मगर धर्म का एक नारा, जाति की एक अफ़वाह और राजनीति की एक चिंगारी पूरे इलाके को संवेदनशील बना देती है।
सवाल है—इलाके संवेदनशील हुए हैं या इंसान असंवेदनशील?
इस बुरे वक़्त में मेरी पत्रकारिता, मेरे शब्द, मेरे वाक्य, मेरा साहित्य, मेरे ब्लॉग—सब कभी-कभी नक्कारखाने की तूती लगते हैं। सामने सत्ता का नगाड़ा है, पैसे का नगाड़ा है, धर्म और जाति का नगाड़ा है, विज्ञापन और ट्रोल आर्मी का नगाड़ा है। सबसे बड़ा नगाड़ा उस बेशर्मी का है जिसने अपराध को उपलब्धि, चाटुकारिता को पत्रकारिता और प्रचार को सत्य बना दिया है।
मगर मैं अपनी क़लम की मृत्यु की घोषणा नहीं करूँगा। मैं यह भी स्वीकार नहीं करूँगा कि मेरे पचास साल बेकार गए। क्योंकि नक्कारखाने हमेशा नहीं रहते। हर सत्ता अपने शोर को अमर समझने की भूल करती है। हर अहंकारी व्यवस्था मानती है कि उसने सवालों को कुचल दिया। मगर इतिहास सत्ता की इच्छा से नहीं चलता। सिंहासन टूटे हैं, साम्राज्य बिखरे हैं, तानाशाह गए हैं, प्रचारतंत्र ढहे हैं—मगर शब्द बचे हैं। इसलिए मैं लिखूँगा। सत्ता पढ़े या न पढ़े। मंत्री डरे या न डरे। अफ़सर सुधरे या न सुधरे। कोई पुरस्कार मिले या न मिले। मैं लिखूँगा, क्योंकि चुप रहना मेरी पचास साल की पत्रकारिता का अपमान होगा। सवाल पूछूँगा, क्योंकि जवाब न देना सत्ता की आदत हो सकती है, सवाल न पूछना मेरा चरित्र नहीं।
और यदि नक्कारखाने के डर से तूती बोलना बंद कर दे तो दोष नगाड़ों का नहीं, तूती की कायरता का होगा।और मैं कायर नहीं हूँ। मेरे पास तीन चीज़ें हैं—स्मृति, सवाल और सच। सत्ता को सबसे ज़्यादा डर इन्हीं से लगता है। इसलिए सुन लो, ऐ नक्कारखाने वालो! अपने नगाड़े और ज़ोर से बजाओ। आवाज़ें दबाओ। सवालों को गालियों में डुबोओ। सच को प्रचार के नीचे कुचलो। इतिहास ने तुमसे पहले भी बड़े-बड़े नक्कारखाने देखे हैं।कहाँ हैं वे?
नगाड़े गए। नगाड़ची गए। नक्कारखाने गए। बचे तो केवल वे शब्द, जिन्हें कभी तूती की आवाज़ समझकर हँसी में उड़ा दिया गया था। मैं पचास साल बाद भी अपनी कलम नहीं रखूँगा। लिखूँगा, सवाल करूँगा, चोट करूँगा और व्यवस्था की आँख में किरकिरी बना रहूँगा। क्योंकि पत्रकारिता का धर्म सत्ता को आराम देना नहीं, उसकी नींद हराम करना है।

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