Rajasthan News: आखिर जयपुर में क्यों नही होती झालावाड़ जैसी कार्रवाई

Rajasthan News: आखिर जयपुर में क्यों नही होती झालावाड़ जैसी कार्रवाई

 

छोटा अखबार।

झालावाड़ में हुई हालिया कार्रवाई ने यह साबित कर दिया है कि जब प्रशासन 'इच्छाशक्ति' दिखाता है, तो बड़े-से-बड़े रसूखदार और हिस्ट्रीशीटरों के अवैध साम्राज्य ताश के पत्तों की तरह ढह जाते हैं। लेकिन यही बुलडोजर जब जयपुर की सीमाओं में प्रवेश करता है, तो मानो उसकी रफ्तार को 'सियासी ब्रेक' लग जाते हैं। गुलाबी नगरी आज अतिक्रमण के ऐसे मकड़जाल में फंसी है, जहाँ सरकारी जमीन को अपनी जागीर समझना कुछ लोगों का पेशा बन गया है।

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सफेदपोशों का संरक्षण और बदमाशों का खौफ—

जयपुर में जेडीए (JDA) और नगर निगम की बेशकीमती जमीनों पर अवैध कब्जों का खेल कोई नया नहीं है। यहाँ दो तरह के 'खिलाड़ी' सक्रिय हैं। पहले वे सफेदपोश, जो खादी की आड़ में भू-माफियाओं के साथ मिलकर सरकारी फाइलों को दीमक की तरह चाट रहे हैं। इनके रसूख का आलम यह है कि जिस जमीन पर पार्क या स्कूल बनना चाहिए, वहां रातों-रात ऊंची दीवारें खड़ी हो जाती हैं और प्रशासन 'दबाव' के चलते केवल नोटिस थमाकर अपने कर्तव्य की इतिश्री कर लेता है।

दूसरे वे हिस्ट्रीशीटर बदमाश, जिन्होंने शहर के बाहरी इलाकों और कच्ची बस्तियों में आतंक के दम पर सरकारी जमीन को 'अघोषित कॉलोनी' में तब्दील कर दिया है। इन अपराधियों के लिए सरकारी जमीन एक सुरक्षित निवेश है। झालावाड़ में जो बुलडोजर चला, वह केवल ईंट-पत्थर नहीं गिरा रहा था, बल्कि अपराधियों के उस अहंकार को कुचल रहा था जो खुद को कानून से ऊपर समझते हैं। जयपुर की जनता आज वही 'बुलडोजर न्याय' अपनी गलियों में देखना चाहती है।

सिस्टम की लाचारी या जानबूझकर की गई अनदेखी?

हैरत की बात यह है कि जयपुर के हृदय स्थल से लेकर बाहरी रिंग रोड तक, हजारों एकड़ सरकारी जमीन पर अवैध दुकानें, आलीशान फॉर्म हाउस और गोदाम तन गए हैं। जेडीए के प्रवर्तन दस्ते अक्सर छोटी-मोटी कार्रवाई करके फोटो खिंचवाते हैं, लेकिन जब बात किसी बड़े 'मगरमच्छ' पर हाथ डालने की आती है, तो फाइलें ठंडे बस्ते में डाल दी जाती हैं। जनता पूछती है कि क्या नियम केवल आम आदमी के लिए हैं? क्या सरकारी जमीन को मुक्त कराने के लिए झालावाड़ जैसा जज्बा जयपुर के अफसरों में नहीं मिल सकता?

जनता की पुकार: जयपुर में कब जागेगा शासन—

राजधानी होने के नाते जयपुर में अतिक्रमण के खिलाफ कार्रवाई एक मिसाल बननी चाहिए। अगर अपराधियों और अवैध कब्जाधारियों के मन में कानून का भय खत्म हो जाए, तो वह शहर के विकास के लिए सबसे बड़ा खतरा है। झालावाड़ की कार्रवाई ने उम्मीद की एक किरण जगाई है, लेकिन वह किरण जयपुर तक पहुँचते-पहुँचते धुंधली नहीं होनी चाहिए।प्रशासन को समझना होगा कि सरकारी जमीन किसी व्यक्ति विशेष की संपत्ति नहीं, बल्कि आने वाली पीढ़ियों के लिए आरक्षित सार्वजनिक संसाधन है। अब समय आ गया है कि जयपुर में भी उन 'सफेदपोशों' और 'बदमाशों' की सूची तैयार की जाए, जिन्होंने सरकारी नक्शे को अपनी मर्जी से बदला है। जनता को खोखले वादे नहीं, बल्कि झालावाड़ की तरह गरजते हुए बुलडोजर और मलबे में तब्दील होता अपराधियों का अहंकार देखना है।

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