JLF 2026: 'साहित्य का महाकुंभ' या 'कॉर्पोरेट तमाशा'
JLF 2026: 'साहित्य का महाकुंभ' या 'कॉर्पोरेट तमाशा' छोटा अखबार। JLF में बौद्धिक दिवालियापन और 'सर्कस' जैसा माहौल देखा गया। आयोजकों के लिए यह गर्व की बात हो सकती है कि यहाँ बड़ी संख्या में लोग आए, लेकिन सच यह है कि इनमें से 80 प्रतिशत लोग केवल 'इंस्टाग्राम रील्स' बनाने और सेलिब्रिटीज के साथ सेल्फी लेने आए थे। सत्रों के बीच गंभीर चर्चा के दौरान भी पीछे 'फूड स्टॉल्स' पर शोर-शराबा और हंसी-मजाक चलता रहा। क्या यह साहित्य का उत्सव है या किसी शॉपिंग मॉल का उद्घाटन? साहित्य के नाम पर धनी और प्रभावशाली परिवारों की तानाशाही: आयोजक 'समावेशिता' की बात करते हैं, लेकिन असलियत में यह फेस्टिवल एक धनी और प्रभावशाली परिवारों का समूह बनकर रह गया है। साधारण हिंदी या क्षेत्रीय भाषा के लेखकों को हाशिए पर रखा गया है, जबकि 'विदेशी लहजे' वाली अंग्रेजी बोलने वाले लेखकों को पलकों पर बिठाया गया। ₹14,000 प्रति दिन वाले 'फ्रेंड ऑफ द फेस्टिवल' पास वालों के लिए मखमली सोफे और आम साहित्य प्रेमी के लिए कंकड़-पत्थर वाली जमीन—यही है आयोजकों का 'लोकतंत्र...