Rajasthan news: जांच रिपोर्ट: डिजिटल इंडिया के दावों की पोल खोलता राजस्थान का खाद्य एवं नागरिक आपूर्ति विभाग

Rajasthan news: जांच रिपोर्ट: डिजिटल इंडिया के दावों की पोल खोलता राजस्थान का खाद्य एवं नागरिक आपूर्ति विभाग


छोटा अखबार।

एक तरफ केंद्र और राज्य सरकारें 'डिजिटल इंडिया' और 'सुशासन' का ढिंढोरा पीट रही हैं, वहीं राजस्थान का खाद्य एवं नागरिक आपूर्ति विभाग (Food & Civil Supplies Department) तकनीकी रूप से पाषाण काल में जी रहा है। विभाग की आधिकारिक वेबसाइट वर्तमान में केवल कागजी औपचारिकता और मंत्रियों की फोटो बदलने का जरिया बनकर रह गई है। जमीनी हकीकत यह है कि आम जनता के लिए उपलब्ध कराया गया डेटा दशकों पुराना और पूरी तरह अनुपयोगी हो चुका है।

15-20 साल से नहीं बदला डेटा—

चौंकाने वाली बात यह है कि वेबसाइट पर तेल कंपनियों और गैस एजेंसियों की जो सूचियां उपलब्ध हैं, उनमें से अधिकांश 15 से 20 साल पुरानी हैं। सरकारें आती-जाती रहीं, मुख्यमंत्री और मंत्री बदलते रहे, और विभाग ने तत्परता दिखाते हुए केवल उनकी तस्वीरें अपडेट करने में ही अपनी ऊर्जा खपा दी। लेकिन जनता की सुविधा से जुड़े महत्वपूर्ण टेलीफोन नंबर, मोबाइल नंबर और पते आज भी वही हैं जो शायद लैंडलाइन के दौर में हुआ करते थे।

गैस एजेंसियों की जानकारी: न पता सही, न फोन मिलता—

उपभोक्ताओं के लिए सबसे बड़ी मुसीबत गैस एजेंसियों की जानकारी को लेकर है। खाद्य एवं नागरिक आपूर्ति विभाग की वेबसाइट पर सूचीबद्ध अधिकांश गैस एजेंसियों के नंबर या तो अस्तित्व में नहीं हैं या फिर वे बंद हो चुके हैं। कई एजेंसियों के पते बदल चुके हैं, लेकिन सरकारी रिकॉर्ड में वे आज भी पुरानी जगहों पर ही चल रही हैं। यदि कोई उपभोक्ता किसी शिकायत या जानकारी के लिए वेबसाइट का सहारा लेता है, तो उसे केवल निराशा ही हाथ लगती है। डिजिटल दौर में भी व्यक्ति को पते खोजने के लिए सड़कों पर भटकना पड़ रहा है।

तेल कंपनियों और अधिकारियों की सूची भी 'आउटडेटेड'—

यही हाल तेल कंपनियों के संपर्क सूत्रों का है। महत्वपूर्ण नंबरों की सूची अपडेट न होने के कारण आपातकालीन स्थितियों में संपर्क करना नामुमकिन हो जाता है। डिजिटल इंडिया का दावा करने वाली सरकार में एक क्लिक पर जानकारी मिलना तो दूर, गलत सूचनाओं के कारण समय की बर्बादी अलग से होती है। अधिकारियों की जो सूची पोर्टल पर मौजूद है, उनमें से कई सेवानिवृत्त हो चुके हैं या उनके तबादले सालों पहले हो चुके हैं।

सिस्टम की सुस्ती पर सवाल—

यह स्थिति विभाग की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े करती है। क्या आईटी सेल और संबंधित अधिकारियों की जिम्मेदारी केवल वेबसाइट के होमपेज पर नेताओं की तस्वीरें चमकाने तक सीमित है? जब मुख्यमंत्री भजनलाल शर्मा जनसेवा को सर्वोपरि बता रहे हैं, तब उनकी ही सरकार का यह 'डिजिटल कबाड़' उनके दावों को मुंह चिढ़ा रहा है। सूचना के अधिकार और पारदर्शिता के इस युग में भ्रामक और पुरानी जानकारी परोसना जनता के साथ एक तरह का धोखा है। यदि विभाग जल्द ही अपनी डिजिटल कमियों को दूर नहीं करता, तो 'राज-उन्नति' और 'त्वरित समाधान' जैसे शब्द केवल फाइलों की शोभा बढ़ाते रहेंगे। जनता को उम्मीद है कि सरकार फोटो बदलने के साथ-साथ सिस्टम के इस 'जंक' को भी साफ करेगी।

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