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दो महीने बाद दिल्ली नहीं जा सकेगी राजस्थान रोडवेज की बसें

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 दो महीने बाद दिल्ली नहीं जा सकेगी राजस्थान रोडवेज की बसें  छोटा अखबार। राजधानी दिल्ली में 31 मार्च के बाद दिल्ली में सिर्फ बीएस-6 की बसें ही संचालित होसकेंगी। सरकार ने यह निर्णय दिल्ली में बढ़ते प्रदूषण को देखते हुए लिया है। इसी कारण राजस्थान राज्य पथ परिवहन निगम की बसे दिल्ली नहीं जा सकेंगी। आपको बतादें कि राजस्थान राज्य पथ परिवहन निगम के पास वर्तमान में करीब 3800 बसों का भण्डार है जो चालू हालत में है। उपरोक्त बसों में से लगभग 3000 बसें निगम की है और करीब 800 बसें अनुबंध पर है। इन बसों में रोडवेज के पास केवल बीएस-3 और बीएस-4 की बसें हि है जिनमें अनुबधित बसें भी शामिल है।  विज्ञापन राजस्थान राज्य पथ परिवहन निगम के पास बीस -6 माॅडल की एक भी उपलब्ध नहीं है। इसी कारण रोडवेज की बसें दिल्ली नहीं जा सकेंगी। निगम सूत्रों के अनुसार बहुत जल्द ही करीब 560 बसों की खरीद की जायेगी। जिसका का कार्य प्रक्रियाधिन है।

प्रदेश के तापमान में बढ़ोतरी

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 प्रदेश के तापमान में बढ़ोतरी छोटा अखबार। वैसे तो प्रदेश में ठंड का दौर जारी है। यहां के अधिकांश इलाकों में न्यूनतम तापमान में थोड़ीसी बढ़ोतरी दर्ज की गई है। मौसम विभाग के अनुसार आगामी दिनों में एक नए पश्चिमी विक्षोभ और पूर्वी हवाओं के आपसी मिलान के कारण पूर्वी राजस्थान में 23 से 27 जनवरी के बीच मौसम में बदलाव का अनुमान है। बदलाव में बादल छाए रहने और कोटा, जयपुर, भरतपुर संभाग के जिलों में कहीं-कहीं बारिश की संभावना जताई है। विज्ञापन

राइट टू हेल्थ बिल के ड्राफ्ट का डॉक्टरों ने किया विरोध

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 राइट टू हेल्थ बिल के ड्राफ्ट का डॉक्टरों ने किया विरोध   छोटा अखबार। राज्य सरकार द्वारा लाया जा रहा राइट टू हेल्थ बिल के विरोध में डॉक्टरों ने प्रस्तावित ड्राफ्ट की प्रतियां जलाई। ये सभी डॉक्टर राइट टू हेल्थ बिल में संशोधन की मांग कर रहे हैं। इन डॉक्टरों ने विसंगतियों की जानकारी देते हुए बताया कि जनता से मांगे गए सुझावों को इस बिल में शामिल नहीं किया गया। बिल के मौजूदा ड्राफ्ट में इमरजेंसी की परिभाषा को परिभाषित नहीं किया गया है। एक्सीडेंट के मामले में घायलों को पहुंचाने वालों को तो 5000 रुपए का इनाम है, लेकिन इलाज करने वाले डॉक्टरों को कुछ नहीं है। इस बिल में पंच, सरपंच, जिला परिषद सदस्यों को शामिल कर एक काला कानून बना दिया है। पहले ही प्राइवेट अस्पतालों पर 50 से अधिक लाइसेंस का भार है। इनका उल्लंघन होने पर अस्पताल सीज कर दिए जाते हैं। अस्पतालों में तमाम सरकारी सुविधाओं पर कॉमर्शियल रेट वसूली जाती है।  विज्ञापन राइट टू हेल्थ बिल के ड्राफ्ट में जिला स्तरीय, राज्य स्तरीय कमेटियों में पंच, सरपंच, जिला परिषद सदस्यों व अधिकारियों को शामिल किया गया है। इन कमेटियों को निजी अस्पतालों का निरी

चलो नायला संगठन का ऐलान, 571 पत्रकार बजट सत्र के दौरान उतरेगें सड़क पर

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चलो नायला संगठन का ऐलान, 571 पत्रकार बजट सत्र के दौरान उतरेगें सड़क पर  छोटा अखबार। मुख्यमंत्री जी कराएं नगरीय विकास विभाग के 20 अक्‍टूबर, 2010, 4 जनवरी, 2011 और 28 फरवरी, 2013 के नीतिगत आदेशों की पालना। चलो नायला संगठन के आह्वान पर नायला पत्रकार नगर के 571 आवंटी पत्रकारों का आंदोलन रविवार को 14वें दिन भी जारी रहा। रविवार को अवकाश के चलते आवंटी पत्रकारों का जत्‍था तो सीएमआर नहीं गया, लेकिन दूरभाष पर सीएम से मिलने के लिए समय मांगा गया। आवंटियों की रविवार को विशेष ग्रुप मीटिंग में आगामी रणनीति पर चर्चा हुई और विधानसभा  शुरू होने के साथ ही आंदोलन तेज कर सड़क पर उतरने का निर्णय किया गया। इस मौके पर ‘मुख्‍यमंत्री जी हमसे मिलो’ पोस्‍टर भी जारी किया गया।  14 दिन से लगातार मुख्‍यमंत्री निवास पर पहुंचकर मिलने का समय मांगने पर भी मुख्‍यमंत्री अशोक गहलोत के समय नहीं देने पर आवंटियों ने तीखी नाराजगी जताई। आवंटी पत्रकारों का मानना है कि मुख्‍यमंत्री को 571 आवंटियों के सम्‍बन्‍ध में कुछ अधिकारी भ्रमित करने का प्रयास कर रहे हैं, जबकि उन्‍हें पिंकसिटी प्रेस एनक्‍लेव, नायला के वास्‍तविक तथ्‍यों का ज्ञान

जागो मुख्यमंत्री जी जागो, नहीं तो डुबो देगें आपके अधिकारी

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  जागो मुख्यमंत्री जी जागो, नहीं तो डुबो देगें आपके अधिकारी छोटा अखबार। मुख्यमंत्री निवास के अधिकारियों का ये कहना कि 13 साल पुरानी पिंकसिटी प्रेस एनक्लेव, नायला पत्रकार नगर की पट्टा वितरण की समस्या वर्तमान पत्रकार आवास समिति में लेकर जाएं, तो क्या जेडीए की पुरानी योजनाओं के सुलटारे भी अब समिति ही करेगी। यह बात आवंटी पत्रकारों के गले नहीं उतरती है। शनिवार को आवंटी पत्रकारों के 11वे जत्थे के पत्रकारों ने सीएमआर के अधिकारियों से साफ कहा कि उन्हें तो मुख्यमंत्री जी से मिलना है, वे ही उनके पट्टों की समस्या का हल निकाल सकते हैं।  चलो नायला संगठन के आह्वान पर 571 आवंटी पत्रकारों का सीएमआर जाकर मुख्यमंत्री के नाम ज्ञापन देकर आवंटन दस्तावेज जमा कराने का क्रम 13वे दिन शनिवार को भी जारी रहा। वरिष्ठ पत्रकार लेशिश जैन, राजेंद्र कासलीवाल, कुंजेश पतसरिया, डा प्रभात शर्मा और मो इकबाल 11वे जत्थे में मुख्यमंत्री अशोक गहलोत से मिलने सीएमआर पहुंचे, लेकिन मुख्यमंत्री की अनुपस्थिति में डिप्टी सेक्रेटरी लक्ष्मण सिंह और ज्वाइंट सेक्रेटरी ललित कुमार ने उनकी पीड़ा सुनी। अधिकारियों ने कहा कि पत्रकारों की आवास सम

गांधीवादी मुख्‍यमंत्री के घर गांधीवादी प्रदर्शन जत्‍थे बनाकर रोज पहुंच रहे पत्रकार

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गांधीवादी मुख्‍यमंत्री के घर गांधीवादी प्रदर्शन जत्‍थे बनाकर रोज पहुंच रहे पत्रकार   छोटा अखबार। गांधीवादी मुख्‍यमंत्री अशोक गहलोत के सरकारी निवास पर पिंकसिटी प्रेस एनक्‍लेव, पत्रकार नगर नायला के आवंटी पत्रकारों का गांधीवादी प्रदर्शन शुक्रवार को दसवें दिन भी जारी रहा। चलो नायला संगठन के आह्वान पर आवंटी पत्रकारों का दसवां जत्‍था मुख्‍यमंत्री निवास पर पहुंचा और जोइंट सेक्रेटरी ललित कुमार से मुलाकात कर मुख्‍यमंत्री से मिलाने और उनके प्‍लॉट के पट्टे शीघ्र जारी कराने की गुहार की।  दसवें जत्‍थे में शामिल वरिष्‍ठ पत्रकार बाबूलाल भारती, जगदीश सोनवाल, ओमप्रकाश मिश्रा, राजेन्‍द्र प्रसाद गुप्‍ता और नीरू गोयल ने ललित मोहन को बताया कि जब तक पिंकसिटी प्रेस एनक्‍लेव, पत्रकार नगर नायला के पत्रकारों से मुख्‍यमंत्री जी नहीं मिलेंगे, तब तक अलग अलग जत्‍थों में पत्रकार आवंटी भी उनके घर रोजाना पहुंचेंगे और गांधीवादी तरीके से अपनी बात रखेंगे। पत्रकारों ने उन्‍हें बताया कि लगातार दस दिन से वे मुख्‍यमंत्री निवास पर अपनी पीड़ा सुनाने आ रहे हैं, लेकिन मुख्‍यमंत्री जी से उनकी मुलाकात नहीं कराई जा रही है। इस पर ललि

चार्जशीट "पब्लिक डॉक्यूमेंट" नहीं -सुप्रीम कोर्ट

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चार्जशीट "पब्लिक डॉक्यूमेंट" नहीं -सुप्रीम कोर्ट छोटा अखबार। शुक्रवार को सुप्रीम कोर्ट ने अपने एक आदेश में कहा कि जांच एजेंसियों को किसी भी मामले की चार्जशीट को पब्‍लिक प्लेटफॉर्म पर अपलोड करने का निर्देश नहीं दिया जा सकता।  यह आदेश कोर्ट ने आरटीआई कार्यकर्ता सौरव दास की दायर एक जनहित याचिका के मामले में दिया है। जस्टिस एमआर शाह और जस्टिस सीटी रविकुमार की पीठ ने याचक दास की जनहित याचिका को खारिज कर दिया। न्यायालय ने कहा कि सभी आरोप-पत्रों को सार्वजनिक डोमेन में डालने का निर्देश सीआरपीसी की योजना के विपरीत है।  विज्ञापन मामले में याचक दास ने कोर्ट को तर्क दिया कि चार्जशीट एक सार्वजनिक दस्तावेज है। यह साक्ष्य अधिनियम, 1872 की धारा 74 में दिए गए सार्वजनिक दस्तावेज की परिभाषा में आता है। कोर्ट ने दास की सभी दलीलों को खारिज करते हुए कहा कि साक्ष्य अधिनियम की धारा 74 में उल्लिखित दस्तावेजों को ही सार्वजनिक दस्तावेज कहा जा सकता है। आवश्यक सार्वजनिक दस्तावेजों के साथ चार्जशीट की प्रति साक्ष्य अधिनियम की धारा 74 के तहत सार्वजनिक दस्तावेज नहीं कहा जा सकता है और कहा चार्जशीट हर किसी को