Jaipur News: मुख्यमंत्री के विधानसभा क्षेत्र सांगानेर में भूमाफिया का खुलेआम नंगा नाच यूडीएच, सहकारिता, जेडीए और रेरा खामोश

Jaipur News: मुख्यमंत्री के विधानसभा क्षेत्र सांगानेर में भूमाफिया का खुलेआम नंगा नाच यूडीएच, सहकारिता, जेडीए और रेरा खामोश


-महेश झालानी


छोटा अखबार।

मुख्यमंत्री के विधानसभा क्षेत्र सांगानेर में इन दिनों भूमाफिया का जबरदस्त नंगा नाच चल रहा है। आम जनता लुट रही है और कथित भूमाफिया फर्जी दस्तावेजों और विवादित इकरारनामों की आड़ में जमीन का अवैध कारोबार खुलेआम चला रहे हैं। सबसे दुखद और चिंताजनक पहलू यह है कि जिस सांगानेर क्षेत्र से स्वयं मुख्यमंत्री विधानसभा में प्रतिनिधित्व करते हैं, वहीं राज्य का सहकारिता विभाग, जेडीए, नगरीय विकास विभाग और रेरा जैसी संस्थाएं मानो खामोश होकर तबाही का यह मंजर देख रही हैं। 

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यदि मुख्यमंत्री के अपने विधानसभा क्षेत्र में सरकारी तंत्र की नाक के नीचे जमीन के इस कथित अवैध कारोबार का इतना बड़ा साम्राज्य खड़ा हो सकता है तो राजस्थान के दूसरे इलाकों की भयावह तस्वीर का सहज ही अनुमान लगाया जा सकता है। स्थिति की गंभीरता का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि गृह निर्माण सहकारी समितियों के नाम पर जमीन और भूखंडों का ऐसा कारोबार चलने की शिकायतें सामने आ रही हैं, जिसमें पुराने इकरारनामों और अन्य दस्तावेजों के आधार पर वर्तमान समय में प्लॉट काटकर लोगों को बेचे जाने के आरोप हैं। जिन लोगों ने अपनी जीवनभर की कमाई लगाकर भूखंड खरीदे हैं, उन्हें बाद में जमीन की वैधानिक स्थिति, लेआउट स्वीकृति, भू-उपयोग और कब्जे जैसी समस्याओं का सामना करना पड़ता है। 

सवाल यह है कि यदि यह सब गलत है तो सरकारी एजेंसियां कार्रवाई क्यों नहीं कर रही हैं और यदि वैध है तो फिर जनता की शिकायतें क्यों खत्म नहीं हो रही हैं? विडंबना देखिए कि सरकार की एजेंसियां समय-समय पर स्वयं जनता को चेतावनी देती रही हैं कि गृह निर्माण सहकारी समितियों की आड़ में होने वाले अवैध भूखंड कारोबार से सावधान रहें। इसके बावजूद पिछले ढाई-तीन वर्षों में जयपुर के आसपास ऐसी गतिविधियों में तेजी आने की शिकायतें लगातार सामने आ रही हैं। यानी एक तरफ सरकारी विज्ञापन और चेतावनियां हैं, दूसरी तरफ जमीन पर कथित अवैध प्लॉटिंग का विस्तार। इस विरोधाभास का जवाब आखिर कौन देगा?

गृह निर्माण सहकारी समिति का मूल उद्देश्य अपने सदस्यों के लिए आवासीय सुविधा विकसित करना है। वह कोई सामान्य प्रॉपर्टी डीलर या निजी कॉलोनाइजर नहीं है। उसे जमीन प्राप्त करने, कॉलोनी विकसित करने और भूखंड आवंटित करने के लिए संबंधित कानूनों और सक्षम प्राधिकारियों की स्वीकृतियों का पालन करना होता है। लेकिन अनेक समितियों ने इस मूल उद्देश्य को पीछे छोड़कर जमीन के कारोबार का रास्ता अपना लिया है। पुराने दस्तावेजों और कथित इकरारनामों को आधार बनाकर ऐसे भूखंड बेचे जा रहे हैं जिनकी वैधानिक स्थिति पर गंभीर सवाल हैं।

यदि किसी समिति के पास जमीन का वैध अधिकार ही नहीं है और फिर भी वह लोगों से भूखंड के नाम पर पैसा ले रही है तो यह केवल सहकारी कानून का मामला नहीं है। इसमें जमीन के स्वामित्व, दस्तावेजों की प्रामाणिकता, भू-उपयोग, कॉलोनी की स्वीकृति और संभावित धोखाधड़ी जैसे अनेक गंभीर प्रश्न खड़े होते हैं। इसलिए ऐसे प्रत्येक मामले की निष्पक्ष और दस्तावेज आधारित जांच होना आवश्यक है। राजहंस, झालाना डूंगरी और हथरोई गढ़ी गृह निर्माण सहकारी समिति सहित दो दर्जन से अधिक समितियों की गतिविधियों को लेकर सवाल उठाए जा रहे हैं। 

इन समितियों के संबंध में जमीन का वास्तविक स्वामित्व क्या है, जमीन कब खरीदी गई, किससे खरीदी गई, क्या सक्षम प्राधिकारी से कॉलोनी का लेआउट स्वीकृत हुआ, पुराने इकरारनामों की वास्तविकता क्या है और कितने भूखंड किस आधार पर लोगों को दिए गए, इन सवालों का जवाब संबंधित सरकारी रिकॉर्ड में मौजूद है। जरूरत केवल उस रिकॉर्ड को सामने लाने की है। और यहीं से सहकारिता विभाग की भूमिका शुरू होती है। सहकारिता विभाग के सचिव समित शर्मा का विभागीय भवन चमक रहा है, कर्मचारी समय पर कार्यालय पहुंच रहे हैं और प्रशासनिक अनुशासन पर जोर दिया जा रहा है। यह सब अच्छी बात है। लेकिन विभाग के सामने असली परीक्षा भवन की चमक नहीं, बल्कि उन गृह निर्माण सहकारी समितियों पर कार्रवाई है जिनके खिलाफ जनता वर्षों से शिकायत कर रही है। 

यदि किसी समिति की गतिविधियां नियमों के विपरीत हैं तो उसके पदाधिकारियों के खिलाफ कार्रवाई क्यों नहीं होनी चाहिए? यदि दस्तावेज संदिग्ध हैं तो उनकी जांच क्यों नहीं होनी चाहिए? और यदि किसी समिति की गतिविधियां पूरी तरह वैध हैं तो विभाग स्वयं उसका रिकॉर्ड सार्वजनिक कर जनता के भ्रम को समाप्त क्यों नहीं करता? जेडीए की भूमिका इससे भी ज्यादा महत्वपूर्ण है। कोई अवैध कॉलोनी एक रात में नहीं बनती। पहले जमीन पर प्लॉट काटे जाते हैं, फिर सड़कें बनती हैं, बिजली-पानी की व्यवस्था होती है, भूखंडों की खरीद-बिक्री शुरू होती है और धीरे-धीरे मकान खड़े हो जाते हैं। ऐसे में यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि जिस इलाके में वर्षों तक यह सब चलता रहा, वहां जेडीए के मैदानी अमले को इसकी जानकारी कैसे नहीं हुई? और यदि जानकारी थी तो कार्रवाई क्यों नहीं हुई?

जेडीए की वेबसाइट पर अवैध कॉलोनियों और अवैध भवनों से संबंधित सूचनाएं उपलब्ध हैं। उसके अपने नियोजन दस्तावेजों में भी आवासीय सहकारी समितियों के माध्यम से कृषि भूमि पर अनियोजित प्लॉटिंग और अव्यवस्थित शहरी विस्तार की समस्या का उल्लेख किया गया है। सवाल इसलिए और गंभीर हो जाता है कि जब समस्या सरकारी दस्तावेजों में दर्ज है तो जमीन पर इसका समाधान क्यों दिखाई नहीं देता? महेंद्र सेज, डिग्गी रोड, महला, अजमेर रोड, बोराज, बिचून, सिरसी रोड और बिंदायका सहित जयपुर के बाहरी इलाकों में अवैध कॉलोनियों के संबंध में लगातार शिकायतें सामने आती रही हैं। 

इन इलाकों में कितनी कॉलोनियां अवैध हैं, कितनी गृह निर्माण सहकारी समितियों से जुड़ी हैं, कितनी के खिलाफ कार्रवाई हुई और कार्रवाई के बावजूद कितनी जगहों पर प्लॉटिंग जारी रही, सरकार को इसका क्षेत्रवार पूरा विवरण सार्वजनिक करना चाहिए। यहां नगरीय विकास विभाग की भूमिका भी सवालों से परे नहीं है। आखिर जेडीए उसी प्रशासनिक ढांचे का हिस्सा है जिसके शीर्ष पर नगरीय विकास विभाग की जिम्मेदारी है। यदि राजधानी में ही अनधिकृत कॉलोनियों का विस्तार होता रहे और संबंधित एजेंसियां उसे प्रभावी ढंग से रोक न पाएं तो जवाबदेही केवल निचले स्तर के कर्मचारियों तक सीमित नहीं रह सकती।

यूडीएच मंत्री झाबर सिंह खर्रा और सहकारिता मंत्री गौतम कुमार दक को भी इस पूरे मामले पर जनता के सामने स्थिति स्पष्ट करनी चाहिए। विपक्ष या मीडिया द्वारा सवाल उठाना अलग बात है, लेकिन हजारों लोगों की जमीन और जीवनभर की बचत से जुड़ा मामला होने के कारण सरकार का जवाब देना आवश्यक है। राजनीतिक दृष्टि से देखा जाए तो यह दोनों मंत्रियों के लिए भी एक बड़ी प्रशासनिक परीक्षा है। यदि उनके विभागों के अधिकार क्षेत्र में आने वाली संस्थाओं के बावजूद भूमाफिया बेखौफ हैं तो यह सरकार की कार्यप्रणाली पर गंभीर प्रश्नचिह्न है।

राजस्थान में रेरा सक्रिय है और रियल एस्टेट परियोजनाओं से जुड़े मामलों में उसका महत्वपूर्ण नियामकीय दायित्व है। लेकिन हर गृह निर्माण सहकारी समिति और हर जमीन विवाद का समाधान केवल रेरा के माध्यम से संभव नहीं है। जमीन का स्वामित्व, सहकारी संस्था का अधिकार, भू-उपयोग, कॉलोनी की स्वीकृति और अवैध प्लॉटिंग जैसे विषय कई अलग-अलग विभागों के अधिकार क्षेत्र से जुड़े हैं।  इसलिए रेरा की सीमाओं का बहाना बनाकर बाकी विभाग अपनी जिम्मेदारी से बच नहीं सकते।

सबसे गंभीर सवाल उन सरकारी अधिकारियों की जवाबदेही का है जिनके कार्यक्षेत्र में कथित अवैध कॉलोनियां विकसित होती हैं। यदि किसी इलाके में लगातार प्लॉटिंग होती है, हजारों लोग जमीन खरीदते हैं और वहां मकान तक बन जाते हैं, तो यह कहना कि संबंधित विभाग को इसकी जानकारी नहीं थी, प्रशासनिक निगरानी की विफलता को ही साबित करेगा। और यदि जानकारी थी तो कार्रवाई क्यों नहीं हुई—यह सवाल और भी बड़ा है।

रिश्वत और संरक्षण के आरोप भी इस पूरे कारोबार के संदर्भ में लगाए जाते रहे हैं। इन आरोपों की स्वतंत्र जांच होनी चाहिए। बिना प्रमाण किसी अधिकारी को भ्रष्ट घोषित करना उचित नहीं है, लेकिन सरकार इन आरोपों को नजरअंदाज भी नहीं कर सकती। यदि किसी अधिकारी या कर्मचारी की संपत्ति उसके ज्ञात आय स्रोतों से असंगत है, यदि किसी खास क्षेत्र में पदस्थापना के दौरान असामान्य रूप से अवैध कॉलोनियां विकसित हुई हैं अथवा शिकायतों के बावजूद कार्रवाई नहीं हुई, तो ऐसे मामलों की जांच भ्रष्टाचार निरोधक एजेंसियों और विभागीय सतर्कता तंत्र के माध्यम से कराई जा सकती है।

तत्कालीन मुख्यमंत्री भैरोंसिंह शेखावत के समय गृह निर्माण सहकारी समितियों से जुड़ी शिकायतों के समाधान के लिए बड़े स्तर पर शिविर लगाए गए थे और आम लोगों को राहत देने की कोशिश हुई थी। उस समय सरकार ने यह संदेश दिया था कि सहकारी संस्था की आड़ में आम आदमी के साथ मनमानी स्वीकार नहीं की जाएगी। आज जरूरत उससे भी बड़े अभियान की है, क्योंकि जमीन की कीमतें और शहरी विस्तार दोनों पहले से कहीं अधिक तेजी से बढ़ चुके हैं।

सरकार यदि सचमुच आम आदमी को भूमाफिया से बचाना चाहती है तो उसे केवल चेतावनी जारी करने के बजाय गृह निर्माण सहकारी समितियों का विशेष ऑडिट कराना चाहिए। प्रत्येक समिति की जमीन, दस्तावेज, स्वीकृति, सदस्यता, भूखंड आवंटन और वर्तमान स्थिति का सत्यापन होना चाहिए। जहां फर्जी दस्तावेज, अवैध प्लॉटिंग और सरकारी जमीन पर कब्जा या जनता से धोखाधड़ी प्रमाणित हो, वहां दोषियों के खिलाफ कानून के अनुसार कठोर कार्रवाई होनी चाहिए।

सांगानेर में चल रहे इस कथित भू-कारोबार की निष्पक्ष जांच इसलिए भी जरूरी है क्योंकि यह मुख्यमंत्री का अपना विधानसभा क्षेत्र है। यदि यहां सरकारी एजेंसियों की मौजूदगी के बावजूद भूमाफिया इतने बेखौफ होकर काम कर सकता है तो यह केवल स्थानीय प्रशासन की समस्या नहीं है। यह पूरे सरकारी तंत्र की क्षमता और इच्छाशक्ति पर सवाल है। मुख्यमंत्री के इलाके में यदि जनता जमीन के नाम पर लुटती रहे, कथित भूमाफिया फर्जी दस्तावेजों के सहारे कारोबार करता रहे और सरकारी विभाग मूकदर्शक बने रहें तो फिर सरकार की सख्ती आखिर दिखाई कहां देगी?

सरकारी भवन की दीवारों पर नया रंग जरूर चढ़ सकता है, लेकिन अगर उसी भवन के अधिकार क्षेत्र में आने वाली जनता की जमीन और जिंदगी सुरक्षित नहीं है तो उस रंग की चमक का कोई अर्थ नहीं। सहकारिता विभाग को तय करना होगा कि वह केवल अपनी इमारत का रंग बदलेगा या उन गृह निर्माण सहकारी समितियों का भी रंग उतारेगा, जिन पर आम आदमी की मेहनत की कमाई हड़पने के गंभीर आरोप हैं।

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